Saturday, August 29, 2026
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विष्णुपद के गर्भगृह में ‘पावन तीर्थ गया जी’ का हुआ देवार्पण, प्रज्ञा भारती को भेंट की गई प्रथम प्रति

गयाजी। श्रावण पूर्णिमा की पावन निशा में मोक्षधाम गया जी के अधिष्ठाता भगवान विष्णु के पावन विष्णुपद मंदिर में शोधपरक ग्रंथ ‘पावन तीर्थ गया जी’ का पारंपरिक लोकार्पण करने के बजाय भावपूर्ण तरीके से देवार्पण किया गया। वैदिक मंत्रोच्चार, दीपमालाओं और जयकारों के बीच ग्रंथ को भगवान विष्णु के श्रीचरणों में समर्पित किया गया। इस दौरान विष्णुपद प्रबंधकारिणी समिति के पदाधिकारी, गयापाल तीर्थपुरोहित समाज, साहित्यकार और शहर के कई प्रबुद्ध लोग मौजूद रहे। ग्रंथ के देवार्पण के बाद इसकी प्रथम प्रति मूल पांडुलिपिकार पं. विष्णुलाल वारीक और समालोचनात्मक संपादक सह विवेचक आचार्य उमाशंकर सिंह ने सुप्रसिद्ध कथावाचिका प्रज्ञा भारती को सादर भेंट की। आयोजकों ने कहा कि जिस कृति में गयाधाम की महिमा, पितृयज्ञ और विष्णुपद की आध्यात्मिक परंपरा का विस्तृत वर्णन हो, उसका पहला अर्पण स्वयं भगवान विष्णु को करना ही इसकी वास्तविक सार्थकता है। ‘पावन तीर्थ गया जी’ की मूल पांडुलिपि पं. विष्णुलाल वारीक ने वर्ष 2004 से 2009 के बीच पांच वर्षों की साधना, अध्ययन और शोध के बाद तैयार की थी। मूल कृति ‘गया जी : तीर्थ-दर्शन’ पर आधारित इस पुस्तक का समालोचनात्मक संपादन एवं विस्तृत विवेचन अनुग्रह मेमोरियल कॉलेज के हिंदी विभाग के प्राध्यापक आचार्य उमाशंकर सिंह ने किया है। पुस्तक का प्रकाशन गया जिला हिंदी साहित्य सम्मेलन ने मंजरी प्रकाशन, चांदचौरा के सहयोग से किया है। ग्रंथ में गया की भौगोलिक स्थिति, प्रमुख वेदियों, गयासुर-धर्मशिला आख्यान, ऋग्वैदिक साक्ष्य, गया-श्राद्ध की परंपरा, गयापाल समाज के इतिहास तथा बोधगया और महाबोधि महाविहार के सांस्कृतिक समन्वय का शोधपरक विवेचन किया गया है। समारोह में विष्णुपद प्रबंधकारिणी समिति के अध्यक्ष शंभुनाथ बिट्ठल सहित समिति के पदाधिकारी, पं. विष्णुलाल वारीक, आचार्य उमाशंकर सिंह, आचार्य प्रवीण पाठक, साहित्यकार और बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। वक्ताओं ने कहा कि यह कृति तीर्थ साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान देने के साथ गया की धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत को समझने में शोधार्थियों के लिए उपयोगी साबित होगी।

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