Tuesday, March 3, 2026
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पीरो में मदारी समुदाय को ‘बांग्लादेशी’ कहकर मतदाता सूची से बाहर करने की साजिश – भाकपा-माले ने उठाई कड़ी आपत्ति

पटना।भाकपा-माले के राज्य सचिव कामरेड कुणाल ने एक बयान जारी कर कहा है कि बिहार में चल रहे वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के नाम पर एक अत्यंत चिंताजनक और असंवैधानिक प्रक्रिया अपनाई जा रही है, जिसमें नागरिकों को गैर-नागरिक घोषित कर वोटर लिस्ट से बाहर करने की साजिश की जा रही है।

ताजा मामला भोजपुर जिले के पीरो का है, जहां मदारी समुदाय के लगभग 50 लोगों को मतदाता सूची से हटाने की तैयारी की जा रही है। ये सभी लोग मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं और वर्षों से यहीं रह रहे हैं, मतदान करते आए हैं, उनके नाम पूर्ववर्ती मतदाता सूचियों में भी दर्ज रहे हैं।

*बीएलओ ने फॉर्म भरे, फिर भी ईआरओ द्वारा आपत्ति*

कामरेड कुणाल ने बताया कि संबंधित बीएलओ (बूथ लेवल ऑफिसर) ने सभी परिवारों के लिए गणना फॉर्म (वोटर वेरीफिकेशन फॉर्म) भर दिए थे। लेकिन अब ईआरओ (इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर) द्वारा कहा जा रहा है कि “ये सब बांग्लादेशी हैं, इनका फॉर्म क्यों भरा जा रहा है?” यह न केवल सांप्रदायिक और पक्षपातपूर्ण मानसिकता को दर्शाता है, बल्कि संविधान प्रदत्त नागरिक अधिकारों का भी खुला उल्लंघन है।

भाकपा-माले ने इस मुद्दे को लेकर चुनाव आयोग को पत्र भेजा है और मांग की है कि इस प्रकार की असंवैधानिक और भेदभावपूर्ण कार्रवाइयों पर अविलंब रोक लगाई जाए।

आयोग की भूमिका पर गंभीर सवाल

कामरेड कुणाल ने सवाल उठाया कि यदि वर्षों से भारत में रह रहे एक समुदाय को बिना किसी वैध प्रमाण के बांग्लादेशी बताकर वोटर लिस्ट से बाहर किया जा सकता है, तो यह सीधा मतदान के अधिकार पर हमला है। चुनाव आयोग की जिम्मेदारी नागरिकों को मुख्यधारा में जोड़ने की होनी चाहिए, न कि उन्हें नागरिकता से वंचित करने की।

एसआईआर = नया एनआरसी?

उन्होंने आगे कहा कि बिहार में चल रही यह SIR प्रक्रिया संविधान द्वारा प्राप्त मतदान के अधिकार पर सीधा हमला है। इस प्रक्रिया में जिन 11 प्रकार के दस्तावेजों की मांग की जा रही है, वह एनआरसी (राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर) जैसी कार्यप्रणाली का हिस्सा प्रतीत होती है। जबकि दिनांक 25 फरवरी 2020 को बिहार विधानसभा में सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित हुआ था कि राज्य में एनआरसी की कोई आवश्यकता नहीं है।

*मंत्री जी का बयान असंगत और भ्रामक*

राज्य के मंत्री द्वारा यह दावा कि एक भी सही मतदाता का नाम नहीं कटेगा, अपने ही सरकारी रवैये से मेल नहीं खाता। यदि आज नागरिकों से यह साबित करने को कहा जा रहा है कि वे भारतीय हैं, तो यह सवाल उठता है कि क्या 2005 से अब तक बिहार में बनी सरकारें ‘गलत मतदाताओं’ के वोट से चुनी गई थीं? यह वक्तव्य लोकतंत्र का उपहास है।

*प्रवासी मजदूरों की संख्या पर भी भ्रामक दावा*

कामरेड कुणाल ने बिहार सरकार के प्रवासी मजदूरों के आंकड़े को भी गंभीर रूप से भ्रामक बताया। सरकार द्वारा यह संख्या सिर्फ 26 लाख बताई गई है, जबकि केंद्र सरकार के श्रम मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार यह संख्या 2.9 करोड़ से अधिक है। ऐसे में बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूरों, दलितों, अल्पसंख्यकों और गरीब तबकों के पास यदि दस्तावेज़ नहीं हैं, तो वे अपने नाम मतदाता सूची में कैसे बचा पाएंगे?

भाकपा-माले ने यह स्पष्ट किया है कि एसआईआर की प्रक्रिया के माध्यम से गरीबों, अल्पसंख्यकों, दलितों और प्रवासी तबकों को मताधिकार से वंचित करने की किसी भी साजिश को सफल नहीं होने दिया जाएगा। पार्टी ने चुनाव आयोग से मांग की है कि:

1. मदारी समुदाय के लोगों के नाम हटाने की प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगे।

2. ईआरओ द्वारा की गई आपत्तिजनक और साम्प्रदायिक टिप्पणी पर कार्रवाई हो।

3. एसआईआर प्रक्रिया को लोकतांत्रिक, पारदर्शी और गैर–भेदभावकारी बनाया जाए।

भाकपा-माले बिहार में जनाधिकारों की रक्षा और लोकतंत्र बचाने की लड़ाई को जनसंगठनों के साथ मिलकर आगे भी जारी रखेगी।

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