गयाजी ।मगध विश्वविद्यालय,बोधगया के संस्कृत विभाग की वरिष्ठ सहायक आचार्य डॉ ममता मेहरा ने संस्कृत दिवस के अवसर पर संस्कृत भाषा के महत्व पर चर्चा करते हुए कहा कि ‘सा प्रथमा संस्कृतिर्विश्ववारा:’ समस्त विश्व की प्रथम संस्कृति जिस भाषा से अनुप्राणित होती है वह भाषा संस्कृत है। विश्व की सबसे प्राचीन भाषा के रूप में संस्कृत ज्ञान और विज्ञान का ऐसा समुचित भंडार है जो प्रकृति से तादात्म्य में भी स्थापित करता है और वैज्ञानिक धरातल पर आधुनिक विज्ञान का भी मार्गदर्शक है। संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, एक जीवन पद्धति है। संस्कृति संस्कारों का सृजन करती है और भाषा संस्कृति के निर्माण का आधार होती है। इस दृष्टि से संस्कृत भाषा संस्कारों की भाषा है। मनुस्मृतिकार ‘सर्वज्ञानमयो हि स:’ कहकर वेदोक्त ज्ञान को समस्त प्रकार के ज्ञान का आधार बताते हैं। संस्कृत उस जीवन शैली का पोषण करती है जहां सत्यभाषण, परोपकार, दानकर्म, सत्कार, नैतिक आदर्श, उदार चरित्र आदि आचरण के मानवीय मूल्यों का तो निदर्शन प्राप्त होता ही है वहीं समस्त वसुधा को कुटुंब मानना, परस्पर द्वेष ना करना, सौहार्द्र और विश्वशांति का डिम-डिम उद्घोष भी संस्कृत भाषा साहित्य में सर्वत्र निनादित होता है।
आज जब ज्ञान के परिदृश्य में पूरा विश्व तीव्रता से परिवर्तन के मुहाने पर खड़ा है, ए आई, मशीन लर्निंग, चैट जीपीटी और तकनीकी विकास के बड़े पैमाने पर प्रयोग के कारण शिक्षा के अर्थ बदल चुके हैं, ऐसे में नई शिक्षा नीति संस्कृत को बढ़ावा देने वाली है। इसका कारण यह है कि तकनीकी दृष्टि से हम चाहे कितने भी सुदृढ़ हो जाएं, आविष्कारों के कारण जितना भी जीवन को संसाधनों से सुसज्जित कर लें, लेकिन आत्मिक शांति, परमसुख तथा मानसिक दृढ़ता संस्कृत के ज्ञान से ही संभव है। संस्कृत किसी वर्ग विशेष की भाषा नहीं अपितु लोक कल्याण की भाषा है, सार्वजनिक उत्थान की भाषा है, वैश्विक शांति की भाषा है, सार्वकालिक समुन्नयन की भाषा है। अतः श्रावणी पूर्णिमा को संस्कृत दिवस के अवसर पर यह हम सबका पुनीत कर्तव्य है कि हम अपनी भारतीय ज्ञान परंपरा के आधारभूत संस्कृत भाषा के प्रति आदर भाव रखें और जिस किसी रूप में भी संभव हो संस्कृत को अपने जीवन का अंग बनाने का संकल्प लें। चाहे एक श्लोक के माध्यम से चाहे एक मंत्र के माध्यम से चाहे किसी संस्कृत के छोटे से ग्रंथ को पढ़कर अथवा संस्कृत की कोई सूक्ति स्मरण करके, चाहे जीवनचर्या में प्रयोग होने वाली वस्तुओं के संस्कृत नाम का अवबोधन करके हम संस्कृत को अपना सकते हैं, जिससे संस्कृत हमारे मन, आचरण और जीवन का परिष्कार कर सके और हम श्रेष्ठ मानव बनकर वैश्विक समरसता एकता और अखंडता का मार्ग प्रशस्त करते हुए सचमुच विश्व गुरु की पदवी को प्राप्त करने के अधिकारी बन सके।












