गयाजी।अनुग्रह मेमोरियल कॉलेज, गया के स्वामी विवेकानन्द सभागार में साहित्यिक सर्जन और श्रद्धा का अद्वितीय संगम दृष्टिगोचर हुआ, जब हिन्दी विभाग एवं आई.क्यू.ए.सी. के संयुक्त तत्वावधान में हिन्दी के मूर्धन्य समालोचक, निबंधकार, प्रशासक और आध्यात्मिक व्यक्तित्व आचार्य विश्वनाथ सिंह के बहुआयामी व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केन्द्रित विशिष्ट व्याख्यान-सह-पत्रिका लोकार्पण समारोह का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम का आरंभ ठीक अपराह्न 12:01 बजे दीप प्रज्वलन और आचार्य विश्वनाथ सिंह के तैलचित्र पर पुष्पांजलि अर्पण से हुआ। इस मंगल क्षण पर मंच पर उपस्थित समस्त अतिथियों की उपस्थिति ने माहौल को गरिमा से भर दिया। बी ए की छात्रा प्रतिमा की वन्दना तथा देमंती के स्वागत गान के साथ कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। इस आयोजन की आत्मा स्वरूप जो सशक्त सूत्रधार रहे, वे थे – डॉ. उमा शंकर सिंह, सहायक प्राध्यापक, हिन्दी विभाग। उन्होंने मंच संचालन को केवल एक औपचारिक कर्तव्य न मानकर, उसे एक साहित्यिक विधान, एक रचनात्मक प्रवाह और एक भाषिक शुचिता का सजीव उदाहरण बना दिया। आचार्य का रचनात्मक परिचय देते हुए डॉ सिंह ने कहा कि आचार्य विश्वनाथ सिंह हिन्दी आलोचना, ललित निबंध लेखन और अकादमिक प्रशासकीय कौशल के त्रिवेणी संगम थे। यह विशेषांक आचार्य विश्वनाथ सिंह के साहित्यिक अवदान को केवल संजोता नहीं, बल्कि नई पीढ़ी के लिए एक मार्गदर्शक ग्रंथ रूप में प्रस्तुत करता है। वस्तुत: यह अंक श्रम, समर्पण और शोध का जीवंत प्रमाण है। यह आयोजन केवल स्मृति या श्रद्धांजलि नहीं था, अपितु साहित्य और शिक्षण के आदर्शों की पुनःस्थापना का एक आत्मिक उपक्रम था। आचार्य विश्वनाथ सिंह का व्यक्तित्व आने वाली पीढ़ियों को शब्द, शुचिता और साधना का संदेश देता रहेगा।
प्रतिभा सृजन के संपादक प्रोफे. पार्थ सारथी (इतिहास विभाग, अनुग्रह मेमोरियल कॉलेज, गया) ने अपने स्वागत भाषण में कहा कि “प्रबुद्ध प्रतिभा का साक्षात्कार केवल शब्दों से नहीं, संवेदना से होता है; आचार्य सिंह उस पीढ़ी के प्रतीक थे जो शिक्षण को तप मानती थी।” उनकी इस स्मृति विशेषांक का लोकार्पण एक पत्रिका का विमोचन नहीं, बल्कि एक पीढ़ीगत विरासत का पुनराविष्कार है। मैं इस पुण्य कार्य में संलग्न सभी साथियों को, विशेषतः डॉ. उमा शंकर सिंह को हार्दिक बधाई देता हूँ, जिन्होंने स्मृति को शोध और श्रद्धा से जीवित कर दिया।”
डॉ. प्रो. उषा सिंह (पूर्व विभागाध्यक्ष, हिन्दी विभाग, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय) ने उद्घाटन वक्तव्य में अत्यंत भावगर्भित एवं विदुषी शैली में कहा— “आचार्य विश्वनाथ सिंह केवल हिन्दी के अध्येता नहीं थे, वे भाषा के नैतिक अनुशासन के संरक्षक थे। उन्होंने हिन्दी आलोचना को ‘संवेदना का संस्कार’ प्रदान किया। उनके लेखन में जहां एक ओर आचार्य रामचंद्र शुक्ल की तर्कपरकता थी, वहीं दूसरी ओर हज़ारीप्रसाद द्विवेदी की भाषिक माधुर्य की छाया भी थी। वे परंपरा के पुनर्पाठ और आधुनिकता के पुनर्संयोजन के मध्य संतुलन स्थापित करते हुए हिन्दी आलोचना को एक नई ऊँचाई पर ले गए। उन्होंने अपने विद्यार्थियों को केवल पाठ्य-पुस्तक नहीं पढ़ाई, बल्कि विचारों की स्वतंत्रता, आलोचनात्मक दृष्टि और रचनात्मक संतुलन का पाठ पढ़ाया। आचार्य सिंह का जीवन स्वयं एक आलोचना था— आत्मालोचना से प्रारंभ होकर सृजनात्मक आलोचना में परिणत होने वाला। वे हिन्दी साहित्य की उस पीढ़ी के अंतिम प्रतिनिधि थे जो विचार को केवल पढ़ती नहीं थी, जीती भी थी।”
दोपहर 12:40 बजे महाविद्यालय की वार्षिक पत्रिका प्रतिभा सृजन के आचार्य विश्वनाथ सिंह स्मृति विशेषांक का लोकार्पण हुआ जिसकी सामग्री का संकलन डॉ. उमा शंकर सिंह ने अत्यंत परिश्रम, शोध और आत्मीयता से किया है, जिसमें आचार्य सिंह के लेखन, व्यक्तित्व और स्मृतियों का सघन आलेखन समाहित है। मुख्य अतिथि एवं अन्य विशिष्ट अतिथियों ने पत्रिका विमोचन के क्षण को “एक साहित्यिक विरासत का उद्घाटन” कहा। डॉ. प्रो. के.के. नारायण (पूर्व विभागाध्यक्ष, अंग्रेज़ी विभाग, गया कॉलेज) ने मुख्य व्याख्यान में कहा— “आचार्य विश्वनाथ सिंह की आलोचना केवल विचार की परिपक्वता नहीं, बल्कि संवेदना की शुचिता भी है। उन्होंने आलोचना को केवल शब्दों का विमर्श न रहने देकर उसे एक सृजनात्मक औचित्य में रूपांतरित किया। उनका लेखन अकादमिक अन्वेषण और लोकमानस की अनुभूति का सुंदर समागम था। उनकी दृष्टि में आलोचना का प्रयोजन केवल समीक्षा नहीं, संवाद था। प्रशासनिक क्षमता में वे जितने निपुण थे, उतने ही उदार, सहृदय और सृजनशील भी थे। उन्होंने अपने विभाग को न केवल एक शैक्षणिक केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित किया, बल्कि एक ऐसी विचारधारा के रूप में विकसित किया जहाँ अध्ययन, मनन और आचरण की त्रैविध साधना दिखाई देती है।”
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. प्रो. रणजीत कुमार वर्मा (संस्थापक कुलपति, मुंगेर विश्वविद्यालय) ने अपने आशीर्वचन में कहा कि “आचार्य विश्वनाथ सिंह उस परंपरा के प्रतीक थे जहाँ शिक्षक केवल विषय नहीं पढ़ाता, बल्कि जीवन के मूल्यों, दृष्टिकोणों और अनुशासन का जीवंत पाठ भी पढ़ाता है। उनके भीतर आचार्य शंकर की स्थिरता, दयानंद की विवेकशीलता और विवेकानंद की विचारधारा का संगम दृष्टिगोचर होता था। वे न तो केवल ‘प्राध्यापक’ थे और न ही केवल ‘प्रशासक’, वे शिक्षाजगत के एक ‘ध्यानस्थ संत’ की भाँति कार्य करते थे। वे उस समय के दुर्लभ शिक्षक थे जिनका प्रभाव उनके शब्दों से अधिक उनके आचरण से फैलता था। आचार्य विश्वनाथ सिंह के लेखन में जहाँ आलोचना की वैचारिकता है, वहीं जीवन की नैतिकता भी व्याप्त है।
डॉ. अनंत कुमार सिन्हा (प्रभारी प्राचार्य, अनुग्रह मेमोरियल कॉलेज) ने संक्षेप में कहा कि “आचार्य विश्वनाथ सिंह केवल विभाग नहीं, संस्थान के भी ‘बौद्धिक आधारस्तम्भ’ थे। वे एक ऐसा व्यक्तित्व थे, जो चुपचाप दिशा देता है।”
इस साहित्यिक संगम में गया जी के प्रसिद्ध विद्वतमंडली के दर्शन हुए एक ओर कृतकार्य प्राचार्यों में डॉ रामकृष्ण मिश्र, डॉ. कृष्णदेव मिश्र, डॉ. अरुण कुमार प्रसाद, डॉ. सुदर्शन शर्मा, राष्ट्रपति से सम्मानित डॉ. सच्चिदा नन्द प्रेमी आदि प्रमुख थे वही दूसरी और गया कॉलेज, जगजीवन कॉलेज, जी बी एम कालेज, टेकरी कॉलेज, दरहेत्ता लारी कॉलेज के अनेक प्राध्यापकों तथा समाजसेवी श्री काशी जी , श्री संजय किशोर आदि के साथ साथ अनुग्रह मेमोरियल कॉलेज के विविध विभागों के अनेक प्रोफ़ेसर लोग थे जिनमे डॉ अमृतेंदु घोषाल , डॉ, अजय कुमार सिंह, डॉ. नीरज कमल, डॉ. धनंजय कुमार, डॉ. निधि त्रिपाठी, डॉ. धनेश्वर राम, डॉ. पूनम कुमारी, डॉ. श्वेता सिंह, डॉ. दिलीप कुमार, डॉ. प्रदीप कुमार, डॉ. राकेश राय , डॉ. मानिक मोहन शुक्ल, डॉ. मीता रानी , डॉ. राजेश रंजन. डॉ महेश हाल डॉ. ब्रजमोहन सिंह, डॉ. विकाश प्रताप सिंह. डॉ. नागेन्द्र सिंह आदि प्रमुख थे.
कार्यक्रम के अंत में डॉ. प्रवीण कुमार सिंह (सह-संयोजक, आई.क्यू.ए.सी. एवं अध्यक्ष, जंतु विज्ञान विभाग) ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए सभी अतिथियों, प्रतिभागियों, आयोजकों और विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त किया।
राष्ट्रगान के साथ यह गरिमामय आयोजन संपन्न हुआ।












