बिहार के मोतिहारी साइबर थाना पुलिस ने एक सनसनीखेज कार्रवाई को अंजाम दिया है। अंतरराज्यीय साइबर ठगी के एक बड़े गिरोह का पर्दाफाश करते हुए पुलिस ने तीन कुख्यात अपराधियों को गिरफ्तार किया। इन गिरफ्तारियों से देश के विभिन्न राज्यों में दर्ज सैकड़ों करोड़ों रुपये की साइबर ठगी के मामलों का खुलासा हुआ है। कुल 6 करोड़ रुपये से अधिक की धोखाधड़ी के इन मामलों में शिकार हुए लोग अब न्याय की उम्मीद कर रहे हैं। साइबर डीएसपी अभिनव परासर के नेतृत्व में तकनीकी निगरानी टीम ने इस सफलता को हासिल किया, जो साइबर क्राइम के खिलाफ पुलिस की सतर्कता का प्रतीक है।
यह कार्रवाई तब शुरू हुई जब साइबर थाना की तकनीकी निगरानी टीम को एक संदिग्ध बैंक खाते की जानकारी मिली। खाता संख्या 20100018589939 में असामान्य लेन-देन की सूचना पर पुलिस हरकत में आ गई। गहन जांच में पता चला कि इस खाते से जुड़े साइबर पुलिस पोर्टल पर कुल 10 शिकायतें विभिन्न राज्यों से दर्ज हैं। शिकायतकर्ताओं ने फर्जी ऐप्स के जरिए स्टॉक मार्केट में निवेश, आईपीओ खरीद और डिजिटल अरेस्ट जैसे घिनौने तरीकों से ठगी का शिकार होने की बात कही। ये तरीके आजकल साइबर अपराधियों का पसंदीदा हथियार बन चुके हैं, जहां वे लोगों को लालच देकर उनके पैसे लूट लेते हैं।
तकनीकी जांच की कमान संभाले साइबर डीएसपी अभिनव परासर ने बताया कि खाताधारक की पहचान मधुबन थाना क्षेत्र के दुलमा गांव निवासी भरत प्रसाद के रूप में हुई। भरत प्रसाद को हिरासत में लेकर पूछताछ की गई। पूछताछ में उसने चौंकाने वाला खुलासा किया। उसने अपना बैंक खाता, मोबाइल नंबर, एटीएम कार्ड और चेकबुक ‘सिविल स्कोर सुधारने’ के नाम पर राजेपुर निवासी जितेंद्र कुमार को सौंप दिए थे। यह सुनने में मामूली लगने वाला बहाना वास्तव में साइबर ठगों का एक सुनियोजित जाल था, जिसके जरिए वे मासूम लोगों को फंसाते हैं। भरत प्रसाद जैसे लोग अनजाने में अपराधियों के लिए ‘मनी म्यूल’ बन जाते हैं, जो ठगी के पैसे को सफेद करने में मदद करते हैं।
भरत प्रसाद के बयान पर पुलिस ने तुरंत मुजफ्फरपुर जिले से जितेंद्र कुमार को हिरासत में ले लिया। जितेंद्र से गहन पूछताछ की गई, जिसमें उसने अपने दो प्रमुख सहयोगियों अमल प्रकाश और ओम प्रकाश के नाम उगल दिए। जितेंद्र की निशानदेही पर पुलिस ने सीतामढ़ी जिले से दोनों अपराधियों को गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी के दौरान इनके पास से भारी मात्रा में आपराधिक सामग्री बरामद की गई। इसमें 1 लाख 20 हजार रुपये नकद, 18 एटीएम कार्ड, 5 मोबाइल फोन, एक मोटरसाइकिल, 6 सिम कार्ड, पासबुक और चेकबुक शामिल हैं। ये सामान ठगी के नेटवर्क को चलाने के लिए इस्तेमाल होते थे।
तकनीकी जांच में और भी कई राज खुल गए। सामने आया कि इन आरोपियों ने विभिन्न बैंक खातों के जरिए करीब 6 करोड़ रुपये की ठगी की वारदातें को अंजाम दीं। ठगों का modus operandi बेहद चालाकी भरा था। वे फर्जी ऐप्स बनाते, जिनमें स्टॉक मार्केट निवेश या आईपीओ अलॉटमेंट का लालच देते। इसके अलावा, ‘डिजिटल अरेस्ट’ का डर दिखाकर लोगों को ब्लैकमेल करते। इस गिरोह के चंगुल में देश के कई राज्य फंस चुके थे, जिनमें बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड समेत अन्य शामिल हैं। साइबर पुलिस पोर्टल पर दर्ज शिकायतें इसकी पुष्टि करती हैं।
गिरफ्तार अपराधियों की पहचान जितेंद्र कुमार (काशीपकरी, मुजफ्फरपुर), अमल प्रकाश (प्रेमनगर, सीतामढ़ी) और ओम प्रकाश (डुमरा, सीतामढ़ी) के रूप में हुई है। तीनों के खिलाफ मोतिहारी साइबर थाना में साइबर ठगी का मामला दर्ज कर लिया गया है। आगे की कानूनी कार्रवाई तेजी से चल रही है। पुलिस अब गिरोह के अन्य सदस्यों की तलाश में जुटी है। साइबर डीएसपी अभिनव परासर ने चेतावनी दी कि साइबर ठगी के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई जाएगी। उन्होंने लोगों से अपील की कि किसी अज्ञात ऐप या कॉल पर निवेश न करें। संदिग्ध लेन-देन की सूचना तुरंत साइबर थाने में दें।
यह कार्रवाई साइबर क्राइम के बढ़ते खतरे के बीच एक मिसाल है। बिहार पुलिस की साइबर विंग ने अपनी क्षमता एक बार फिर साबित की। पिछले कुछ महीनों में साइबर ठगी के मामले तेजी से बढ़े हैं, खासकर कोविड के बाद डिजिटल लेन-देन बढ़ने से। राष्ट्रीय साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल पर प्रतिदिन हजारों शिकायतें दर्ज हो रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे गिरोह विदेशी सर्वरों से भी जुड़े होते हैं। मोतिहारी पुलिस की इस सफलता से अन्य थानों को प्रेरणा मिलेगी।
लोगों को सतर्क रहने की जरूरत है। फर्जी वेबसाइट्स, व्हाट्सएप ग्रुप्स या कॉल्स से बचें। हमेशा आधिकारिक ऐप्स का इस्तेमाल करें। अगर कोई संदिग्ध कॉल आए तो तुरंत 1930 पर कॉल करें। यह गिरोह भंडाफोड़ न केवल ठगी का शिकार लोगों को न्याय दिलाएगा, बल्कि साइबर अपराधियों में खौफ भी पैदा करेगा। पुलिस की यह जीत बिहार की साइबर सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
*मोतिहारी से जिला ब्यूरो चीफ की रिपोर्ट*












