आहर-पईन के अवैध कब्जे पर अतिक्रमण मुक्त कर पेड़ बचाना भी जरूरी-बीडीओ
विश्व पर्यावरण दिवस पर हुआ सेमिनार
मनमीत एडवरटाइजिंग ने किया आयोजन
वजीरगंज।विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर गुरुवार को मनमीत एडवरटाइजिंग एंड न्यूज एजेंसी कें द्वारा पर्यावरण संतुलन में जन प्रतिनिधियों का एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किय़ा गया साथ ही कार्यशाला में उपस्थित सभी चयनित प्रतिभागियों को पर्यावरण मित्र सम्मान 2026 से सम्मानित किय़ा गया| कार्यशाला कें नुख्य अतिथि वरिष्ठ पत्रकार सह सेवानिवृत प्रधानाध्यापक उपेंद्र कुमार पथिक ने गया जिला प्रशासन से गया से राजगीर तक फैली पहाड़ी श्रृंखला पर बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण की मांग की।
श्री पथिक ने कहा कि हंसरा, केनारचट्टी, कुर्किहार सहित दर्जनों गांवों के आसपास की छोटी-छोटी पहाड़ियां कभी घने जंगलों से ढकी थीं। 30-40 साल पहले तक यहां साल,सूखा कहुआ महुआ के बड़े पेड़ थे। लेकिन ईंट भट्ठा और लकड़ी माफिया ने उन्हें काट दिया। नतीजा ये हुआ कि इलाके का तापमान 2-3 डिग्री बढ़ गया और बारिश का पैटर्न भी बदल गया।
उन्होंने आंकड़े देते हुए बताया कि 1980 के दशक में वजीरगंज प्रखंड में 12 बड़े आहर और 25 से ज्यादा पईन थे। उन्होंने सवाल उठाया कि आज आधे से ज्यादा या तो सूख गए हैं या उन पर लोगों ने कब्जा कर लिया है। “जब पहाड़ नंगे हो जाएंगे और जलस्रोत पाट दिए जाएंगे, तो भूजल पर खतरा होगा |
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वजीरगंज के बीडीओ प्रभाकर सिंह ने कहा कि सरकारी योजनाओं से हर साल लाखों पौधे लगते हैं, लेकिन बचते 20% भी नहीं। “आने वाले भविष्य की सुरक्षा केवल पेड़ लगाने से नहीं, बल्कि लगे हुए पेड़ों को बचाने से है। इसके लिए गांव-गांव में वन सुरक्षा समिति बनानी होगी।
बीडीओ ने खुद अपने वास्तु विहार आवास पर पुत्र के साथ पीपल का पौधा लगाकर लोगों को संदेश दिया।
सेमिनार में उप मुख्य पार्षद संजीत कुमार चौधरी, मुखिया राज कुमार शर्मा, पंसस आनंद मिलिंद, निर्वाचन पदाधिकारी सत्येंद्र प्रसाद सिंह सहित कई जनप्रतिनिधि मौजूद थे। सभी ने संकल्प लिया कि अपने-अपने क्षेत्र में आहर-पईन के अतिक्रमण हटवाकर उनका जीर्णोद्धार कराएंगे।
कार्यक्रम का संचालन महेश कुमार सुमन ने किया। अध्यक्षता बीडीओ प्रभाकर सिंह ने की। धन्यवाद ज्ञापन आयोजक मनमीत एडवरटाइजिंग एंड न्यूज एजेंसी के निदेशक प्रभाकर कुमार ने किया।
दक्षिण बिहार में सदियों से किसान आहर यानी तालाब और पईन यानी नहर बनाकर खेती करते आए हैं। गया-राजगीर की पहाड़ियों से निकलने वाले झरनों का पानी इन आहर-पईन में जमा होता था। अब ये परंपरा खत्म होने से खेती और पेयजल दोनों संकट में हैं।
