गया।शिक्षा सबका अधिकार है, लेकिन सबको बराबर अवसर मिले – यही समावेशी शिक्षा है।
आज हमारे विद्यालयों में हर वर्ग, हर क्षमता के बच्चों को एक साथ पढ़ाने की बात होती है। सरकार की योजनाएं भी दिव्यांग, पिछड़े और वंचित बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ने पर जोर दे रही हैं। शनिवार को मध्य विद्यालय बिच्छा में हुई शिक्षक-अभिभावक संगोष्ठी में भी “विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को शत-प्रतिशत नामांकन” का संकल्प लिया गया। यह सकारात्मक कदम है।
लेकिन सिर्फ नामांकन से समावेशी शिक्षा पूरी नहीं होती। असली परिवर्तन अब जरूरी है।
कहां है जरूरत?
-संसाधनों की कमी
अधिकांश सरकारी विद्यालयों में रैम्प, ब्रेल लिपि, श्रवण यंत्र, विशेष शिक्षक और थेरेपी की सुविधा नहीं है। बिना संसाधन के दिव्यांग बच्चे सिर्फ “बैठने” के लिए विद्यालय आते हैं, “सीखने” के लिए नहीं।
-शिक्षकों का प्रशिक्षण
सामान्य शिक्षक को विशेष बच्चों को पढ़ाने की तकनीक नहीं आती। कमलेश कुमार उर्फ मुन्ना सर जैसे जागरूक शिक्षक अपवाद हैं। हर शिक्षक को समावेशी शिक्षा का प्रशिक्षण मिलना चाहिए।
अभिभावकों की मानसिकता-
आज भी कई परिवार दिव्यांग बच्चों को स्कूल नहीं भेजते। उन्हें लगता है “पढ़कर क्या होगा”। संगोष्ठी जैसी पहल से इस सोच को तोड़ना होगा।
योजनाओं का क्रियान्वयन
छात्रवृत्ति, पोशाक, उपकरण की राशि समय पर नहीं मिलती। कागज पर योजना बड़ी दिखती है, धरातल पर बच्चा वंचित रह जाता है।
समाधान क्या है?
-हर प्रखंड में रिसोर्स रूमऔर विशेष शिक्षक की नियुक्ति
-शिक्षकों के लिए नियमित कार्यशाला
-अभिभावकों के लिए जागरूकता अभियान
योजनाओं की ऑनलाइन ट्रैकिंग ताकि लाभ सीधे बच्चे तक पहुंचे
समावेशी शिक्षा का मतलब सिर्फ एक बेंच पर सबको बैठाना नहीं है। इसका मतलब है – हर बच्चे की क्षमता को पहचानकर उसे आगे बढ़ने का मौका देना। जब तक व्यवस्था में बदलाव नहीं होगा, तब तक “शत-प्रतिशत नामांकन” का नारा अधूरा रहेगा।सरकार, शिक्षक, अभिभावक और समाज – चारों को मिलकर यह तय करना होगा कि हमारा विद्यालय भेद नहीं, अवसर दे।तभी “हर बच्चा पढ़ेगा, तभी देश बढ़ेगा” का सपना सच होगा।
(ये लेखक सह शिक्षक प्रभाकर कुमार का निजी विचार है )
